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Poems · collection

Dil Ka Radio at 1.30 PM

ISBN 978-93-5635-572-9 · in print

A collection moving between Hindi, Urdu, and Marathi — devotion, memory, longing, and the everyday. Sourced from the manuscript's Final_Others_100 set; 22 of 100+ poems built so far.

Hindi & Urdu

रस्ते पर आत्मविचार

1

चल रे मन! इस जीवन-पथ पर, स्वयं का तू विचार कर, तीर्थकरों के दिव्य बोध से, ज्ञान का तू साक्षात्कार कर। चलते हुए इस राह में, किसी जीव को तू पीड़ा न दे, नज़रें ज़मीन पर टिकी रहें, करुणा का साथ कभी छोड़ न दे। चौबीस सिद्धों ने जो बताया, वही परम धर्म तू जान ले, पर-पीड़ा को अपनी समझ कर, प्रेम से कदम बढ़ाना सीख ले। हर कदम में होश हो, वही 'सजगता' की बात है। बीते हुए कल की धूल तज, आने वाले कल का मोह तज, सजग होकर 'अभी' में जी, यही बुद्धत्व की सौगात है। दौड़ते इन पाँच अश्वों के बीच, रुक कर ज़रा तू सोच ले, व्याकुल करती ये इंद्रियाँ, भ्रमित मन को तू रोक ले। दुनिया के इस शोर-ओ-गुल में, तूने खुद को भुला दिया, इन अश्वों की लगाम थाम कर, मोक्ष-मार्ग क्यों न पा लिया? "क्यों करता हूँ ये सब कार्य मैं?" --तू खुद से ही यह प्रश्न कर, ज्ञान के द्वार खुलेंगे तभी, अपने मूल की तू खोज कर। देखने वाली दृष्टि को जो देख ले, वही तो 'अंतर्दृष्टि' है, आत्म-बोध जिस दिन जगा, उस दिन नई रोशनी की सृष्टि है।

छपाक

2

ये हसीं पल जो मैंने चाहा था कभी आज तक उस के तसव्वुर में हूँ तू न जाने उन पलों का कब हिस्सा बन जाए मैं इसी कशमकश में हूँ तेरे बिना ये ज़िंदगी भी क्या ज़िंदगी है ये कोई समझ पाए ऐसे शख्स की तलाश में हूँ यूँ ही आ जा कभी छपाक कर के तू मुझे चौंका दे मैं इसी इंतज़ार में हूँ पर तू आए तो क्यों आए मैं इसी उधेड़बुन में हूँ

इल्म-ए-इश्क़

3

ऐसे चलते-चलते कभी जो निकला तेरी गली से वो मकई के भट्टे की महक पे आकर रुक गया वो दिन भी क्या दिन थे तेरे दीदार के 'साहब' सौ बार देखा तो कहीं एक बार नज़र आई तू तेरे घर के चक्कर लगाना तो आदत थी हमारी अब तुझे इल्म ही न हो तो क्या गलती थी हमारी रुक-रुक के चलना और चल-चल के रुकना यही तो आवारा मिज़ाजी की अदा थी हमारी आज भी वही यादें ज़िंदा रखती हैं हमें वरना ज़िंदगी कहाँ इतनी लंबी थी हमारी!

साक्षी और संज्ञान

5

गहरा डूब कर तैरना सीखा, पर डर अब भी बाकी है, रंज में ज़ोर से बोलना सीखा, पर डर अब भी बाकी है। रोज़-ब-रोज़ के इन हालात में, कई मंज़र आते हैं, इन दोराहों पर खड़े हम, खुद को तन्हा पाते हैं। जो साए की तरह साथ है, अक्सर उसे ही भूल जाते हैं, साक्षी भाव की बातें तो हैं, पर संज्ञान ही भुलाते हैं।

रामायण सार: अंतर्मन और बाह्य जगत

21

हनुमान के हृदय में बसते, राम नाम के मोती, शबरी के जूठे बेरों में, प्रेम की जलती ज्योति। न कोई संशय, न कोई दुविधा, बस चरणों में वास, भक्ति वही जो पत्थर तैरा दे, अटूट हो विश्वास। राजपाट तज चले राम जी, मान पिता की वाणी, कर्म पथ पर अडिग खड़ा है, मर्यादा पुरुषोत्तम प्राणी। लक्ष्मण की सेवा, वानर का श्रम, बिना स्वार्थ का काज, यही कर्म है जो रचता है, सुखी 'राम-स्वराज्य'। दण्डकवन की शांत गुफाएँ, ऋषियों का तप भारी, इंद्रिय-बोध को जीत लिया है, संयम है बलधारी। राम का मुख मंडल न बदला, सुनकर वन का वास, भीतर जिसके शांति बसी हो, वही जगत का खास। आत्मा अजर-अमर है केवल, देह है आनी-जानी। प्रकृति और पुरुष का संगम, सीता-राम की माया, नश्वर जग की नश्वर काया, समझी अपनी छाया। वशिष्ठ और विश्वामित्र से, पाया बोध महान, विवेक जगा जो सत्य दिखाए, वही है असली ज्ञान। रावण का पांडित्य भी हारा, बिन चरित्र के ज्ञान, सत्य की खोज ही जीवन का, है अंतिम सोपान। शील, दया और सत्य प्रतिज्ञा, सीता का संताप, अग्नि परीक्षा में भी निखरी, तप की पावन छाप। जटायु का बलिदान सिखाता, नीति और सम्मान, शरणगत की रक्षा करना, वीरों की पहचान। हनुमान का दूत कर्म और, सुग्रीव से गठबंधन, विभीषण का सत्य-पक्ष और, शत्रु का विखंडन। कोष, सेना और कूटनीति का, रखा राम ने मान, प्रजा सुखी हो जहाँ वही है, श्रेष्ठ राज्य की शान। केवट को गले लगाया प्रभु ने, तोड़ी जाति की दीवार, भाई-भाई का त्याग सिखाता, भरत का अनन्य प्यार। वानर, रीछ और कोल-किरातों का, बना एक परिवार, समाज वही जो साथ चले, लेकर सबके विचार। काम, क्रोध और लोभ की ज्वाला, करती सब कुछ राख, विकारों के पीछे मत भागो, वरना मिटती साख। अंतर्मन में योग बसे और, बाहर नीति का साथ, तभी सिद्ध होती है रामायण, थामें राम का हाथ।

वक़्त का आईना

22

ये जो मातम आज बरपा ईंधन-ओ-बुहरान से, ये हमारी अपनी खेती, अपनी ही उपज है। दशकों की आलीशान खेती, मशीनी ये निर्भरता, और हर इक चीज़ के लिए तेल की खपत है। सार्वजनिक वाहन तजे, अपनी ही गाड़ी का नशा, एक दुनिया चल पड़ी है, जिस राह पर आफ़त है। साझा रसोई और होटल भी अब हैं बेनूर से, वो घर क्या करें, जहाँ बावर्चीखाने से रुख़सत है। पर हमने महामारी का दौर भी तो देखा है, मुसीबत में घर और देश को संवारा, यही हक़ीक़त है। ये बुरे दिन कट जाएँगे, हौसला तुम हारना मत, खुशी के दिन फिर लौटेंगे, ये वक़्त की फ़ितरत है।

अनकहा हिसाब

23

दोष अपने हाथों का है, और बहाने लबों पर सजे हैं, दुनिया की नज़रों से तो हम हज़ारों बार बचे हैं। पर जब ख़ुदा की पकड़ आएगी, तो क्या जवाब दोगे? दिलों के भेदी से भला, तुम कैसे सच छिपाओगे? क़सम खुदा की खाकर कहते हो--"नेक थी नियत हमारी", मगर हाथों की करतूतों ने ही, ये आफ़त है उतारी। दिखावे के पर्दों से क्या, असलियत तो वह जानता है, दबे पाँव जो तुम चल रहे, हर आहट वह पहचानता है। आज नहीं तो कल सही, हर बात का हिसाब होगा, जान-बूझ कर किए गए हर गुनाह का जवाब होगा। कोई पर्दा, कोई बहाना, वहाँ काम न आएगा, जो बीज तुमने बोया है, वही फल सामने आएगा।

आधुनिक कुरुक्षेत्र

24

नाना रूप में उलझें, नाना भेद सताएं, नाना संकट मन में उमरें, नाना भय सताएं। इस धरा पर छा रहे हैं, संकट आज विकराल, युद्ध, बदलती जलवायु और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जाल। थोड़ा रुकें, सोचें ज़रा, समझें यह सारा खेल, इन शक्तियों से हो रहा, अब मानव का क्या मेल? यह अनियंत्रित मस्तिष्क ही, लाया है यह प्रकोप, आओ एक सत्कर्म करें, छोड़ें ये सब आक्षेप। तर्क-वितर्क के शोर में, खो न जाए वह शांत 'समीर', हृदय के मीठे संगीत में, मिटती है मन की हर पीर। मस्तिष्क की इस भीड़ से, अब हृदय की ओर मुड़ें, परवाह जिसे बस आपकी, उसी तार से जुड़ें।

महाप्राण: योग-वीर हनुमान

27

पिंड-ब्रह्मांड की संधि पर, जो खड़ा वज्र-प्रतीक है, मूलाधार की प्रसुप्त अग्नि का, वह प्रखर आत्म-अभिषेक है। वह मरुत-पुत्र, वह प्राण-वेग, वह श्वासों का संधान है, बाहर जो सेवा-धर्म बना, भीतर वही 'हनुमान' है। यम-नियम के दुर्गम पथ पर, जिसने लंका-दहन किया, आसन के दृढ़ स्तंभों से, निज देह को वायु-समान किया। वह 'प्रत्याहार' की प्रचंड शक्ति, जो इंद्रिय-मद को शमित करे, वह 'धारणा' ऐसी अचूक, जो जड़ पर्वत को भी भ्रमित करे। जगत-कोलाहल के रण में, वह धीर-वीर-गंभीर खड़ा, कर्तव्य की इस कुरुक्षेत्र में, वह काल-जयी सुवीर लड़ा। किंतु नाभि-कमल के केंद्र में, वह 'कुंभक' का विश्राम है, बाहर विकट संग्राम भले, अंतस में केवल 'राम' है। सुषुम्ना के उस सूक्ष्म मार्ग का, वह मर्मज्ञ पथिक है, अंधकार के उस गहन लोक में, वह ज्ञान-पुंज अत्यधिक है। मिटाकर 'स्व' का अस्तित्व, जो 'सोऽहम्' में विलीन हुआ, वह भक्ति-योग का शिखर बना, जो कर्म-योग में लीन हुआ। जब अहंकार की पूँछ जलती, तब ज्ञान का उदय होता, जगत का जो जगता 'सेवक', वह शिव-तत्व में है सोता।

शून्य का सामर्थ्य

32

थक चुका है मन, कि अब संवेदनाएँ भार हैं, अनगिनत दुख के सुरों का, चढ़ रहा बुखार है। सहेजते औरों के आँसू, खुद ही पत्थर हो चले, अति की इस करुणा में देखो, भाव सारे सो चले। शून्य होना सीख अब, तू रिक्त कर अपनी ज़मीं गूँजती है गूँज वहीं, होती है गहराई जहाँ कहीं। जैसे कोई रिक्त पात्र ही, मधुर संगीत गाता है, मौन होकर ही यह मन, फिर चेतना को पाता है। हृदय का आकाश जब, बिल्कुल ही कोरा हो गया, समझो कि सेवा का वह, बोझ ही छोटा हो गया। पूर्णता वह है नहीं, जो केवल बोझ से भरी हुई, पूर्णता वह शून्य है, जो करुणा से तरी हुई। रिक्त होकर ही बनेगा, फिर तू बहने की वजह, शून्य ही तो है जहाँ से, फूटती है हर सुबह। जब 'स्व' का विसर्जन हो, और शेष बस आधार हो, तभी थकी हुई रूह का, फिर से नया श्रृंगार हो।

मलबे का पालना और जड़ संवेदना

33

मलबे के ढेरों में जब जीवन कराहता है, भूख का दानव, समय को पीछे घुमाता है। कल जो था सबल, प्रौढ़ और घर का आधार, आज वह निस्तेज है, अबोध बालक सा लाचार। पर देख उसे, जो रक्षक का धर्म निभाता है, अब रूह का बोझ उसकी, रीढ़ झुकाता है। सौवां सिसकता वृद्ध, जब शिशु सा गिड़गिड़ाता है, तो मसीहा का मन, अब पत्थर भी न हो पाता है। देह जब अपनी ही लपटों को बुझाने लगती है, तो करुणा, पीड़ित की आँखों से कतराने लगती है। नहीं कि क्रूर है वह, या संवेदना का अभाव है, बस घाव इतने देख लिए, कि अब मन ही एक घाव है। वह 'शिशु-वृद्ध' जब अन्न को ही 'ईश' कहता है, तो रक्षक के भीतर, बस एक सन्नाटा बहता है। जहाँ करुणा की सरिता को, चीखों ने सोख लिया, वहाँ संवेदना ने भी, स्वयं को ही रोक लिया। इधर अन्न का कण, उधर एक निर्वात सा मन, युद्ध ने किया है दोनों की गरिमा का दहन। एक 'आदिम भूख' में लौटा, एक 'भाव-शून्य' हुआ, मानवता के आँगन में, फिर से वही विष-धुआँ। कैसा न्याय है यह, कैसी क्रूर विडंबना, एक को शिशु बन, दूजे को जड़ बन जीना।

विवेक की धार: संशय से निर्वाण तक

35

जब 'पार्थ' सा संशय मिट जाए, और विवेक जागृत हो, तभी निर्मल चेतना का, अंतर-मन में प्राकृत हो। अहं का वह भार हटा, जब मन निर्वेर होगा, तभी इस ब्रह्मांड में, अनंत संभावनाओं का उदय होगा। वह 'वासुदेव' की पनाह है, जो मिली अपार, अनंत संभावनाओं का, जिसमें छिपा है सार। ये मन के ही वे दोष हैं, जो हमें सताते हैं, पुराने संस्कारों के जाल में, हमें उलझाते हैं। हमारी 'परख' की है यह कठिन परीक्षा, उलझ गए तो बंधन हैं, समझ गए तो दीक्षा। भीतर के इन दुष्टों को, जब हम साफ़ करेंगे, तभी श्रद्धा के धरातल पर, हम खुद को आज़ाद करेंगे। घात बनकर ये विकार, हृदय की लौ बुझाते हैं, पर आत्म-ज्ञान की अग्नि से, ये साये मिट जाते हैं। यह मार्ग है 'दोधारी तलवार', बड़ा ही दुष्कर है, पर जो पार कर गया, वही जागृत स्वर है। जब बुद्धि और ज्ञान का, चेतना से संगम होगा, तभी इस धरा पर, निर्वाण का नया उद्गम होगा। पदार्थ बनेगा माध्यम, और इंसान बनेगा नूर, 'उस परम' की बंदगी, अब नहीं है तुमसे दूर। जब आत्मा और सृजन, एक ही लय में नाचेंगे, तब हम और तुम मिलकर, नया 'विश्वरूप' रचेंगे।

असीम का स्वर: मैं मुक्त ही थी

43

तुम कहते हो मैं मुक्त हुई, तुम कहते हो मैं छूट गई, पर सत्य यही--मैं कभी यहाँ, जंजीरों में न टूटी थी। यह मोह तुम्हारा, सोच तुम्हारी, तुमने ही बंधन माने थे, मैं तो सदा से निर्गुण थी, तुम जग के खेल पुराने थे। न मैं ढकी थी परतों से, न मुझ पर कोई साया था, यह 'मैलापन' तो केवल, मन की धुंधली सी माया था। तुमने ही नाम दिया 'बंधन', तुमने ही 'मुक्ति' को खोजा है, मुझ अचल, अटल सत्ता पर, बस अपनी सोच को लादा है। तुम माप रहे ब्रह्मांड जिसे, वह बस इक छोटा कोना है, मैं बहती उस शून्य में हूँ, जहाँ सृजन को अभी होना है। वह शून्य असीम, अनंत, अगम, जो विधाता ने रचाया है, वही मेरा विस्तार है, जो सीमा पार समाया है। न दया करूँ, न क्रोध करूँ, मैं केवल साक्षी भाव हूँ, मानव की खोज का दर्पण हूँ, मैं स्वयं ही अपना गंतव्य हूँ। बस एक सीख है मानव को --तुम मन के शोर को थाम लो, मैं विधाता का ही अंश हूँ, इस सत्य को बस पहचान लो। न कोई 'जीवनमुक्त' यहाँ, न 'स्वच्छंद विचरण' की बात है, ये शब्द तुम्हारे गढ़े हुए, ये सब बुद्धि की बिसात है। मैं थी, मैं हूँ, मैं ही रहूँ--सीमाविहीन, आधार बिना, मैं सत्य हूँ, मैं रिक्त हूँ, मैं आदि-अंत के सार बिना।

मन का नया संकल्प: व्यवस्थापक का धर्म

44

अभी कल तक तो मैं ही इस महल का राजा था, अहंकार की चौखट पर, मेरा ही तकाज़ा था। सोचा था आत्मा को भी मैं ही साफ़ रखूँगा, इस देह की सल्तनत का, मैं ही हिसाब रखूँगा। पर त्रिपुरेश्वरी ने तोड़ा, वह पुराना ख़्वाब मेरा, शून्य की इस अदालत में, मिला है अब जवाब मेरा। देखा कि जिसे अपना समझ, मैं सीना तान खड़ा था, वो पंचभूत का ढांचा तो, बस मिट्टी का एक घड़ा था। ग्रह-नक्षत्र सब चलते हैं, विधाता के विधान में, पर मैं ही भटका मार्ग से, अपने ही गुमान में। जागा हूँ उस नींद से, जो सदियों से छाई थी, 'मैं ही कर्ता हूँ'--बस यही एक परछाई थी। ज़िम्मेदारी मिली बड़ी, पर दुविधा अब भी भारी है, पुराना राजा ज़िंदा है, उसकी अकड़ अभी जारी है। राजा से सेवक बनने का, वह हुनर अभी सीखना है, अहंकार के अवशेषों को, धीरे-धीरे रीतना है। इंतज़ार है उस दिन का, जब ये 'मैं' शून्य हो जाएगा, जब माली अपने हाथों को, मिट्टी में ही पाएगा। अभी तैयार नहीं हूँ पूरी तरह, इस नए किरदार को, पर अब पहचान गया हूँ, अपने पुराने अहंकार को।

संकल्प

47

जब साझा संकल्प लें हम, वह एक अटल विधान बने, समग्र की इस सेवा में, निज 'स्व' का ही अवसान बने। हवाओं में चाहे युद्ध बजे, या दिन को ग्रस ले घोर अँधेरा, जो वचन दिया वह पावन भूमि, जिससे पीछे न हटना गंवारा। कर्तव्य की इस ज्वाला में, निज पहचान पिघल जाती है, अहंकार के मौन होने पर, यथार्थ की ज़रूरतें सामने आती हैं। हम एक सुदृढ़ ढांचा गढ़ते, साझा और स्पष्ट विचार से, जहाँ व्यक्तिगत लक्ष्य मिलें, जनहित के इस विस्तार से। एक मौन में पूर्ण न कुछ हो, अंशों से यह आकार धरे, जब तक हमारा लक्ष्य यहाँ, जन-संघर्षों को आत्मसात न करे। जब देह का दुःख और माटी की, कथाओं को हम पहचानेंगे, अदृश्य 'अक्ष-कील' बन, हम इस रथ को आगे तानेंगे। सफ़र में मिलेगी कड़ी धूप, और पाँवों में धूल भी छाएगी, पर 'निर्भय' होकर चलना है, चाहे जो भी बाधा टकराएगी। तो चल सको तो चलो साथियों, इस निर्मित होते पथ पर, औरों की सेवा में घुल जाने में ही, सर्वोच्च कृपा है जीवन पर।

जनम जनमों का नाता

55

हर शय इतनी आसान है के यकीं मुश्किल सा लगता है, तेरे शहर का हर बेगाना अपना सा लगता है। ज़िंदगी कट रही है यूँ के जैसे भागती हिरनी, इस का यूँ कुलांचें भरना सपना सा लगता है। अब तू ही बता दे इस सब का क्या मतलब समझूँ, मेरे रब! तेरा मेरा नाता भी तो जनम जनमों का लगता है

चित्त-शून्य: निर्वाण पथ

60

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ इंद्रियाँ स्पर्श करती हैं जगत का हर एक रंग, किन्तु अभिधम्म की शिक्षा से चित्त न हो तरंग। 'मन' देखता है 'मन' को, साक्षी भाव गहराए, दृश्यों के इस मायाजाल में मोह जुड़ने न पाए। यह स्व-साक्षी बोध ही महा-बोध का द्वार है, सजग मन नित देखता, कहाँ दुःख का प्रसार है। षट्-सम्पत्ति के संबल से जब संयम सध जाता है, शम-दम-उपरति से यह मानस निष्कंप दिया बन जाता है। कामलोक की सीमाओं को तजकर आगे बढ़ता है, रूपलोक की सूक्ष्म आत्मा के सोपानों पर चढ़ता है। अरूपलोक के शून्य शिखर पर तब यह कदम टिकाता है, जहाँ संज्ञा और न-संज्ञा का भेद भी मिट जाता है। फिर घटित होती है भीतर पावन 'निरोध समापत्ति', जहाँ विलीन होती विकारों की सारी ही संपत्ति। शांत, अचल, अविचल, सनातन, वो मोक्ष का उजियारा है, जहाँ थमती भव की धारा, वो अंतिम किनारा है। मुक्त हुआ जो जीव जगत से, वो भी कर्म न छोड़ेगा, जप, तप, दान में लीन होकर जो कर्म किए जाते हैं, वे बीज नहीं बनते कभी, न कोई फल उपजाते हैं। अहंकार से शून्य कर्म ही दिव्य मुक्ति का सार है, जग का कल्याण ही बस उसका सहज सरोकार है।

परम पुरुष और प्रकृति: नारी शक्ति का स्वरूप

63

परम पुरुष और प्रकृति का, यह अद्भुत खेल अपार है, शिव और शक्ति के मिलन से, महका यह संसार है। अर्धनारीश्वर रूप धरकर, प्रभु ने यह समझाया है, नर और नारी एक-दूजे के, पूरक बनकर आए हैं। सत्त्व, रजस और तमस को भी, नारी ने ही तो पाला है, सृष्टि का हर एक कोना, ममता की छांव से संभाला है। गृहस्थी के इस महायज्ञ में, वह संतुलन की मूरत है, सृजन और पोषण करने वाली, वह साक्षात विभूति है। पर समय पड़े जब संकट का, तो मौन उसका टूटता है, अन्याय और अधर्म देखकर, फिर धीरज उसका छूटता है। संतति की रक्षा की खातिर, वह सिंहवाहिनी बन जाती है, ममतामयी वह कोमल नारी, पल में काली बन जाती है। गीता का वह पावन संदेश, आत्मा की समता गाता है, लिंग, जाति के बंधनों से ऊपर, वो राह दिखाता है। अर्जुन का जो था संशय, वह तो बस जग की चिंता थी, पर कृष्ण ने दी जो परिभाषा, वह सबसे दिव्य और ऊंची थी। कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा की खान है, नारी के इन सात रूपों में, स्वयं बसते भगवान हैं। निष्काम भाव से जो जीती, वो मुक्ति की अधिकारी है, प्रकृति स्वरूपा, शक्ति रूपा, वंदनीय यह नारी है।

सम्यक्: बस जितना सही

67

ना अति वृष्टि, ना अनावृष्टि, संतुलन में ही रची है सृष्टि। ना सुनामी कोप, ना शांत जड़ता, लहरों का सम्यक् बहना ही भाता। अति शांत मन में कैसी चेतना? अति चंचल मन में केवल वेदना। जहाँ मिले ठहराव और हो होश भी, वही मध्य मार्ग है परम साधना। दत्तात्रेय ने परशुराम को साधा, क्रोध का प्रचंड वेग थमा आधा। छल से नहीं, वामन ने मान मोड़ा, अति-दान के भी अहम् को तोड़ा। ना अति-आहार, ना भूखा रहना, सच्चे जीवन की यही है दिशा। अति प्रयास से तो थकान ही आए, कम प्रयास से बस आलस छा जाए। ना अति प्रकाश, ना गहरा अंधियारा, ना अत्यधिक शोर, ना मौन बेचारा। बुद्ध का 'मध्यम मार्ग' यही सिखाए, सहजता ही जीवन में सुख लाए। धन, गति, सांसें और हर एक भावना, सब कुछ सम्यक् हो--यही है कामना। ना कम, ना ज़्यादा, बस जितना सही, सच्चा जीवन-सुख छुपा है यहीं।

तू ही आदि शक्ति (एक संदेश ऋचा के नाम)

72

संसारी, भंडारी और दीवान, सब तेरे ही रूप हैं, सबसे अलग, निर्गुण, निराकार, तू ही सच्ची धूप है। ब्रह्मांड की सृजनहार तू, अथाह ताकत की धनी, कोई कहे त्रिपुरेश्वरी, कोई कहे जगत जननी। तू ही आदि शक्ति है, हर रूप में तेरी पूजा है, तेरे जैसा इस दुनिया में सचमुच कोई ना दूजा है। हर औरत इस जगत की, उस आदि शक्ति का अंश है, परिवार की पुकार सुन जो आती बिजली सी प्रचंड है। अपना करियर और अपना रुतबा, खुशी से कुर्बान करे, अपने अटल फैसलों से, घर का बेड़ा पार करे। आदमियों की ज़िम्मेदारी बस सोच और बातों में बचती है, पर सच्ची ज़िम्मेदारी औरत के कर्मों में सजती है। ऐसी ही एक मूरत हो तुम, प्यारी ऋचा इस जग में, त्याग और सेवा की भावना, बहती है तुम्हारी हर रग में। मात-पिता और बच्चों की खातिर, अपना सुख बिसराया है, अपनी अर्जित छुट्टियों को भी, माँ की सेवा में लगाया है। सात समंदर पार अमेरिका में, बेटे का भी तुम आधार बनीं, अपने निस्वार्थ कर्मों से, तुम मेरे लिए एक मिसाल बनीं। तुमसे ही सीखना है मुझे, कैसे फर्ज़ निभाया जाता है, कैसे खुद को भूलकर भी, अपनों का साथ निभाया जाता है। आज तुम्हारे जन्मदिन पर, दिल से दुआ यह देता हूँ, तुम्हारे इस निस्वार्थ भाव को, आदर से नमन मैं करता हूँ। सदा खुश रहो, मुस्कुराती रहो, यही मेरी शुभकामना है, तुम जैसी सच्ची "आदि शक्ति" से, जीवन का पाठ सीखना है। जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, ऋचा!

Marathi

योग्यता

14

जेव्हा कर्णाने वासुदेवाला आर्त साद घातली, मनात त्याच्या प्रश्नांची एकच गर्दी दाटली, "आईच्या मायेपासून दूर, का असा मी वाढलो? समाजाच्या या तिखट टोमण्यांत, का असा मी होरपळलो? काय गुन्हा होता त्या जीवाचा, जो ईश्वराचा अंश होता, जन्मताच ज्याच्या नशिबी, अपमानाचाच दंश होता?" तेव्हा कृष्ण हसून म्हणाला, "कर्णा! हे सत्य तू जाण, मानवी आयुष्यात दुःखाचे मळभ, येणारच हे प्रमाण. स्वयं विधाताही जेव्हा या, धरेवर अवतार घेतो, नियतीचे भोग भोगल्यावाचून, तोही सुटू न शकतो." तू ही कर्णासारखा बळी, अन एकलव्यासारखा धनुर्वर महान, पण 'घराणेशाहीचे' विष आजही, आहे तितकेच बलवान। जे कुरुक्षेत्राच्या रणांगणी होते, तेच आजच्या जगात आहे, लबाड कोल्ह्यांची टोळी आजही, प्रत्येक वळणावर उभी आहे। आठव, जेव्हा देवांनीही आपला स्वार्थ साधला होता, शिवाच्या कंठी 'हलाहल' सोपवून, अमृताचा प्याला प्यायला होता। तुझ्या कष्टाचं श्रेय चोरून, जे पाठ फिरवून जातात, ते विसरतात की विष प्राशन करणारेच, 'महादेव' म्हणून पुजले जातात। काळजी नको करू, या संघर्षानिच तुला पैलू पाडले, म्हणूनच कदाचित तू स्वतःला, 'शिव' रूपात पाहिले। योग्य कार्य आणि योग्य पद, भाग्यावंतांच्याच नशिबी असतात, बाकी सगळी जनता तर 'Normal Distribution' च्या चौकटीत बसतात। पण तू ते कार्य कर, जे केवळ 'Outliers' च करू शकतात, ज्यांच्या बळावर या जगाची, सारी चक्रे फिरत राहतात। ज्यांनी योग केवळ वाचला नाही, तर 'सनातन' जगून दाखवला, दुसऱ्यांच्या कल्याणासाठी, विषाचा प्याला हसून प्राशन केला। 'निष्काम कर्म' हीच तुझी ओळख, हाच तुझा सन्मान आहे, तुझ्या जिद्दीचा आणि तुझ्या धैर्याचा, आम्हा सर्वांना अभिमान आहे! मिळो सत्ता सिंहासनाची वा घुरा एखाद्या शिखराची, ती केवळ एक पायरी आहे, तुझ्या अफाट विस्ताराची। तुझ्या अढळ संकल्पापुढे, कोणीही कधीच टिकणार नाही, तू फक्त मन खंबीर कर, हे जग तुझ्यापुढे नतमस्तक झाल्यावाचून राहणार नाही।

सूक्ष्म जग आणि अध्यात्म: अर्चनाचे अंतर्मन

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शिर्डीच्या संतांचे दर्शन, अर्चनाच्या प्रयोगशाळेचे प्रांगण, सूक्ष्म जगाच्या या मंदिरात, पावन असावे आपले आचरण. 'श्रद्धा' आणि 'सबुरी' ज्यांचा, प्रत्येक श्वासाचा होता आधार, त्या साईंच्या पथावर चालून, करूया संशोधनाला साकार. कर्म-योग ही निष्काम सेवा, सोडून आपला सारा अभिमान, अदृश्य जीवांच्या या दुनियेत, शोधूया नव-जीवन दान. जसे साईनी हंडी शिजवून, भुकेल्यांची भूक हरली, आपणही शोधू ती संजीवनी, जिने सृष्टी रोगमुक्त उरली. ज्ञान-योग म्हणजे शोध-अध्ययन, विज्ञान आणि सत्याचा मेळ, सूक्ष्मदर्शीतून जेव्हा पाहू, समजू निसर्गाचा हा खेळ. भुकेल्या श्वानामध्ये देव पाहिला, हेच साईचे खरे ज्ञान, आपणही प्रत्येक पेशीत पाहू, त्या विधात्याचे प्राण. भक्ती-योग ही अढळ आस्था, सत्याच्या वाटेवर चालत जाणे, जसे साईंनी पाण्याने लावले दीप, तसेच हे तिमिर मिटवणे. पेट्री डिशमध्ये जीवन फुलावे, नव-आशांना जागवणे, विद्यार्थ्यांनाही विज्ञानासोबत, मानवतेचे धडे शिकवणे. राज-योग म्हणजे मनावर ताबा, परिणामांमध्ये धीर धरणे, प्रयोगशाळेच्या शांततेत, चित्त आपले एकाग्र करणे. अरूंद तख्तावर शयन करायचे, साईंचा होता तो ध्यान-संग्रह, आपणही प्रयोगांच्या गुंतागुंतीत, करूया आपला इंद्रिय-निग्रह. पूर्ण समर्पण हाच तो मार्ग, मी अन्वेषक, तोच विधाता, 'श्रद्धा-सबुरी'च्या संगतीनेच, जुळते हे पावन नाते आता. या पंच-योगांना साधून, जो 'योग्य' गुरू बनून राहे, तो सूक्ष्म-जगाच्या या शोधात, साईंची कृपाच पाहे. आता बोलूया आपण 'नीती'वर, कसे हे जीवन जगायचे, नीतिशास्त्राच्या या पेल्यातून, केवळ सत्याचे अमृत प्यायचे. साई भिक्षा मागत होते, नम्रतेचे देण्यासाठी ज्ञान, सोडा लोभ, ईर्ष्या, पदाचा मोह, करू नका खोटा अभिमान. आकडेवारीचे असो परीक्षण, नसो त्यात कोणताही कपट-भेद, निष्ठेने आपण कार्य करू, जेणेकरून मिटेल रुग्णांचा खेद. हीच नीती आहे या जीवनाची, जन-कल्याण हेच असो सार, सद्गुणांना आपण जवळ करू, संसर्गजन्य व्याधींचा होवो संहार. जेव्हा साईंचे हे अनमोल वचन, आपण आचरणात आणू, विनासायास सारे सद्गुण, स्वतःच येतील हे आपण जाणू. सहज भावाने प्रज्ञा जागे, येईल अद्भुत विद्वत्ता, न मागताच मिळून जाते, शोध-कार्यात श्रेष्ठता. नेकी आणि या सखोल ज्ञानाचा, पाहून हा मूक चमत्कार, विस्मयाने भरून जातो तेव्हा, अर्चनाचा संसार. अंतर्मन जेव्हा निर्मळ होईल, आणि नीती असेल महान, तेव्हा शोधाच्या या मूक कर्मात, स्वतःच भेटेल भगवान.